कुचामन सिटी. आधुनिक दौर में जहां आए दिन माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ने और बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें सामने आती हैं, वहीं कुचामन सिटी में एक परिवार ने रिश्तों की खूबसूरती और संस्कारों की मिसाल पेश की है।

गोदावरी गार्डन के पास रहने वाले एक परिवार के तीन पौत्रों ने अपनी 64 वर्षीय दादी को पालकी में बैठाकर भगवान के दर्शन करवाए और उनके प्रति अपने प्रेम, सम्मान और समर्पण का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया।

बजरंगलाल कुमावत ने बताया कि उनकी दादी जीवनी देवी की इच्छा थी कि सावन के पवित्र महीने में उन्हें भगवान के दर्शन करवाए जाएं। दादी की इस इच्छा को पूरा करने के लिए उनके पौत्र बजरंग, भूपेंद्र और दिनेश ने उन्हें पालकी में बैठाया और शनिवार को घर से काव्य ऋषि कुंड के लिए रवाना हुए।
24 घंटे की यात्रा के बाद घर लौटे
तीनों पौत्र अपनी दादी को पालकी में बैठाकर कठिन पहाड़ी रास्ते से होते हुए काव्यऋषि कुंड तक लेकर पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने दादी के वजन के बराबर जल भरा और उसे कांवड़ के रूप में अपने कंधों पर लेकर वापस घर की ओर रवाना हुए। करीब 24 घंटे के सफर के बाद तीनों पौत्र रविवार को अपनी दादी के साथ घर लौटे।

इस दौरान जब आसपास के लोगों और समाज के लोगों को उनके इस अनूठे प्रयास की जानकारी मिली तो उन्होंने तीनों पौत्रों की जमकर सराहना की और उन्हें शुभकामनाएं दीं। लोगों ने कहा कि आज के दौर में जब रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं, ऐसे समय में इन युवाओं ने अपने संस्कारों और बुजुर्गों के प्रति सम्मान का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया है।
बजरंगलाल कुमावत ने बताया कि इस पहल के पीछे केवल दादी की इच्छा पूरी करना ही उद्देश्य नहीं था, बल्कि आज की युवा पीढ़ी को एक संदेश देना भी था। उन्होंने कहा कि जिन माता-पिता और बुजुर्गों ने हमें बचपन में अपनी गोद में खिलाया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया और जीवन के संस्कार दिए, उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें हमारे प्यार और सहारे की सबसे अधिक जरूरत होती है। उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ देना या उनकी भावनाओं से दूर हो जाना हमारे संस्कारों की पहचान नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि दादी को पालकी में बैठाकर ले जाना उनके लिए सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का माध्यम था। जिस तरह श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता के प्रति सेवा और समर्पण की मिसाल कायम की थी, उसी भावना को आज की पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास उन्होंने किया।
परिवार ने बताया कि दादा गोरूराम कुमावत, पिता अर्जुन राम कुमावत और माता नाथी देवी ने भी हमेशा परिवार में बड़ों के सम्मान, सेवा और संस्कारों को प्राथमिकता दी। इन्हीं संस्कारों को आगे बढ़ाते हुए पौत्रों ने अपनी दादी के प्रति यह भावपूर्ण पहल की।






