कुचामन सिटी. अपर जिला एवं सेशन न्यायालय कुचामन के न्यायाधीश सुन्दर लाल खारोल ने शुक्रवार को चर्चित श्यामसुन्दर हत्याकांड में मात्र 8 माह में फैसला सुनाते हुए अभियुक्तगण प्रकाश उर्फ पीके और विनोद उर्फ पांग्या निवासी मिण्डा को आजीवन कारावास एवं प्रत्येक को तीन-तीन लाख रुपए के अर्थदंड की सजा सुनाई है। अर्थदंड का भुगतान न करने पर दोनों को दो वर्ष का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा।


अपर लोक अभियोजक मनीष शर्मा ने बताया कि यह घटना 11 दिसंबर 2024 की है। मृतक श्यामसुन्दर जो मिण्डा गांव का निवासी था, अभियुक्तगण के पड़ोस में ही रहता था। अभियुक्त प्रकाश उर्फ पीके और विनोद उर्फ पांग्या ने उसे बुलाकर अपने साथ ले गए थे। जब वह देर शाम तक घर नहीं लौटा, तो परिवार ने उसकी तलाश शुरू की। अगले दिन गांव के पास गढ़ क्षेत्र में एक शव मिलने की सूचना मिली। वहां पहुंचने पर मृतक श्यामसुन्दर की निर्मम हत्या की पुष्टि हुई।

पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ मामला दर्ज कर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) और 3(5) के तहत अपराध प्रमाणित मानते हुए आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया। अभियोजन पक्ष ने सुनवाई के दौरान 22 गवाहों के बयान और 87 दस्तावेजी साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत किए।
बहस पूरी होने के बाद न्यायाधीश सुन्दर लाल खारोल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि –
“जब कोई व्यक्ति किसी की निर्दयता से हत्या करता है, तो वह न केवल एक व्यक्ति की जान लेता है, बल्कि मानवता के मूल मूल्यों को भी घायल करता है। ऐसे अपराध करने वाले किसी भी व्यक्ति को दंड से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि मृतक और अभियुक्तगण एक साथ केटरिंग का कार्य करते थे, और इस अपनत्व का फायदा उठाकर आरोपियों ने उसे घर से बुलाकर सुनसान स्थान पर ले जाकर शराब पिलाई और निर्मम हत्या कर दी। इसके बाद शव के अंगों को विच्छेदित किया गया, जिसे न्यायालय ने “बेहद घिनौना और निंदनीय अपराध” बताया।
न्यायाधीश खारोल ने अपने निर्णय में कहा कि – “यह अपराध केवल हत्या नहीं बल्कि दोस्ती और विश्वास की भी हत्या है। ऐसे अपराध समाज की सहिष्णुता और अपनापन की भावना का गला घोंट देते हैं। इस कारण अभियुक्तों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी न्यायोचित नहीं मानी जा सकती।”
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि नए आपेक्षित आपराधिक कानूनों के तहत इलेक्ट्रॉनिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों को विशेष महत्व दिया गया है, जिससे न्यायालय को त्वरित निर्णय देने में सहायता मिली।
इस मामले में परिवादी पक्ष की पैरवी अधिवक्ता प्रेमसिंह बीका ने की।






