Wednesday, April 29, 2026
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नावां/सांभर झील में फिर पक्षियों की मौत, 2019 में मरे थे हजारों, पिछले साल भी सैकड़ों की मौत; प्रशासन मौन

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नावां/ सांभर झील में एक बार फिर प्रवासी पक्षियों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया है। 2019 में हजारों पक्षियों की मौत के बाद, पिछले वर्ष भी झील में सैकड़ों पक्षी मृत पाए गए थे।

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अब एक बार फिर मृत और संक्रमित पक्षी झील के किनारों पर मिले हैं। कई घायल पक्षी उड़ने तक की स्थिति में नहीं हैं, जिन्हें वन विभाग की टीम रेस्क्यू कर रही है।

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प्रशासन ने हालात की गंभीरता को देखते हुए शुक्रवार को वन विभाग, पशुपालन विभाग, रिफाइनरी प्रबंधन और पर्यावरण विशेषज्ञों की संयुक्त बैठक बुलाई है, ताकि मौत के कारणों की पहचान कर स्थिति को नियंत्रण में लाया जा सके।

पानी में प्रदूषण और संक्रमण की आशंका

नागौर डीएफओ विजय शंकर पांडेय ने बताया कि नावां क्षेत्र से सटे हिस्सों में मृत और संक्रमित पक्षी मिले हैं। झील में तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। मृत पक्षियों के निपटारे और घायल पक्षियों के उपचार के लिए विशेष व्यवस्थाएँ की गई हैं।

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प्रारंभिक जांच में यह संभावना जताई जा रही है कि झील का पानी रासायनिक प्रदूषण की चपेट में है। आसपास की नमक रिफाइनरियों से निकलने वाला जहरीला अपशिष्ट झील में पहुंच रहा है, जिससे पानी में घुले रासायनिक तत्व पक्षियों के लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि झील में कई और मृत पक्षियों के अवशेष मौजूद हैं, जो अब तक पानी में डूबे या दूर फैले होने के कारण सामने नहीं आ पाए हैं।

2019 और 2024 में भी हुई थी बड़ी मौतें

सांभर झील में पक्षियों की मौत की यह घटना नई नहीं है।

  • 2019 में एवियन बॉटूलिज्म (Avian Botulism) नामक संक्रमण के कारण 25,000 से अधिक प्रवासी पक्षियों की मौत हुई थी।

खबर – नावां शहर/कुचामन न्यूज: सांभर झील में एक बार फिर पक्षियों की जान पर खतरा, कई पक्षियों की मौत

  • अक्टूबर 2024 में भी झील क्षेत्र में 100 से ज्यादा पक्षी मृत पाए गए थे, जिनकी वजह बॉटूलिज्म ही मानी गई थी।

एवियन बॉटूलिज्म एक न्यूरोमस्कुलर रोग है जो जंगली जलपक्षियों को प्रभावित करता है और उनके तंत्रिका तंत्र को निष्क्रिय कर देता है, जिससे वे उड़ या खा नहीं पाते और मर जाते हैं।

एसीएफ आकांक्षा गोठवाल ने बताई प्राथमिक वजह

सहायक वन संरक्षक (ACF) आकांक्षा गोठवाल ने बताया कि झील के साल्ट एरिया में केमिकल रिफाइनरी का अपशिष्ट पक्षियों की मौत का प्राथमिक कारण हो सकता है। उन्होंने कहा कि बायो-केमिकल ऑक्सीजन लेवल में कमी के कारण एल्गी ग्रोथ बढ़ जाती है, जिससे बॉटूलिज्म बैक्टीरिया पनपते हैं। मृत पक्षियों के शरीर से यह बैक्टीरिया पानी में घुलकर अन्य पक्षियों को संक्रमित करते हैं, जिससे मौतों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।

संवेदनशीलता कार्यशाला का हुआ था आयोजन

6 अक्टूबर 2024 को राजस्थान सरकार के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के आदेशानुसार कुचामन सिटी में “एवियन बॉटूलिज्म से संबंधित बीमारियों की रोकथाम, जागरूकता और पूर्व तैयारी” के उद्देश्य से एक दिवसीय संवेदनशीलता कार्यशाला आयोजित की गई थी। इस कार्यशाला की अध्यक्षता सहायक वन संरक्षक आकांक्षा गोठवाल ने की थी, जिसमें अधिकारियों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के उपायों पर विस्तार से चर्चा की।

हालांकि, हर साल झील में पक्षियों की मौतों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन केवल संवेदना जता रहा है, जबकि इन जीवों की सुरक्षा और मौतों को रोकने के ठोस कदम अभी तक पर्याप्त रूप से नहीं उठाए गए हैं।

वन विभाग के अनुसार अब तक चार मृत पक्षियों के शव बरामद किए गए हैं और 13 घायल पक्षियों को रेस्क्यू कर इलाज के लिए भेजा गया है। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है।

अधिकारियों ने बताया कि झील के पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद ही पक्षियों की मौत के सटीक कारणों की पुष्टि हो सकेगी।

सांभर झील के बारे में – 

सांभर झील राजस्थान की सबसे बड़ी अंतर्देशीय खारे पानी की झील है, जो जयपुर, नागौर और अजमेर जिलों में फैली हुई है और लगभग 230 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। यह जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। 11वीं शताब्दी से यह झील नमक उत्पादन का प्रमुख केंद्र रही है और भारत के कुल नमक उत्पादन में इसका योगदान लगभग 9% है। इसके जैविक महत्व को देखते हुए 1990 में इसे रामसर साइट घोषित किया गया।

झील का नाम चौहान राजपूतों की कुलदेवी शाकंभरी देवी से प्रेरित है। यह न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि एक प्रमुख पक्षी अभयारण्य के रूप में भी जानी जाती है। सर्दियों में उत्तर एशिया और साइबेरिया से हजारों प्रवासी पक्षी यहां आते हैं।

झील में पाए जाने वाले प्रमुख पक्षी प्रजातियों में ग्रेटर और लेसर फ्लेमिंगो (जिनकी संख्या दसियों हजार तक होती है), नॉर्दर्न शोवेलर, ब्लैक-हेडेड गल, ग्रेट व्हाइट पेलिकन, ब्लैक स्टॉर्क, लिटिल ग्रेब, ग्रेट क्रेस्टेड ग्रेब, लिटिल कॉर्मोरेंट, डार्टर, कोट्स, ब्लैक-विंग्ड स्टिल्ट्स, रेडशैंक्स, सैंडपाइपर्स, विभिन्न प्रकार के प्लोवर्स, इग्रेट्स, हेरॉन्स, गीसे, डक्स, पोचार्ड्स, पिनटेल्स, गैडवॉल्स और बार-हेडेड गीसे शामिल हैं। कुल मिलाकर यहां 80 से अधिक जलपक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जो इसे पक्षी प्रेमियों के लिए आदर्श स्थल बनाती हैं।

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