कुचामन सिटी की सियासत में हाल ही में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। नगर परिषद में बीजेपी ने कांग्रेस के सभापति आसिफ खान और उपसभापति हेमराज चावला की कुर्सी छीनकर सत्ता पर कब्जा कर लिया।


नवनियुक्त सभापति सुरेश सिखवाल का शहर में जगह-जगह स्वागत-सम्मान हो रहा है वहीं कांग्रेस का विरोध अब केवल सोशल मीडिया की पोस्ट तक सिमट गया है।

दरअसल, फरवरी 2021 से कुचामन सिटी नगर परिषद पर कांग्रेस का शासन रहा। करीब एक माह पहले स्वायत्त शासन विभाग के निदेशक जुईकर प्रतीक चंद्रशेखर द्वारा जारी नोटिस में सभापति आसिफ खान पर नियमविरुद्ध कर्मियों की पदोन्नति और उपसभापति हेमराज चावला पर नियमविरुद्ध सरकारी भूमि का उनके द्वारा पट्टा बनवाने के आरोप लगाए गए।
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इन आरोपों के आधार पर दोनों को निलंबित कर दिया गया। लेकिन कांग्रेस की ओर से विरोध की जगह अब बिल्कुल सन्नाटा छाया हुआ है।
कांग्रेस का विरोध सड़कों पर नहीं सोशल मीडिया पर
निलंबन के बाद कांग्रेस ने हार तो मान ली लेकिन उसका विरोध सड़कों पर उतरने के बजाय सोशल मीडिया तक सीमित रह गया।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इस निलंबन को “लोकतंत्र की हत्या” करार देते हुए बीजेपी पर राजनीतिक दुर्भावना का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि “बीजेपी की तानाशाही के खिलाफ अब जनता को ही आगे आना होगा।”
लेकिन कुचामन में कांग्रेस ने इस बात को शायद ज्यादा गंभीरता से लिया और अपना सारा गुस्सा सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित कर दिया। पूर्व मुख्य उप सचेतक और नावां विधायक महेंद्र चौधरी साथ ही महिला प्रदेश अध्यक्ष सारिका चौधरी ने भी इस विरोध को फेसबुक और ट्विटर (अब X) तक ही रखा। धरातल पर विरोध का कोई नामोनिशान नहीं दिखा।
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बीजेपी की जीत कांग्रेस की खामोशी – जहां एक तरफ सुरेश सिखवाल के सम्मान समारोहों की धूम मची है वहीं कांग्रेस की खामोशी सवाल खड़े कर रही है। केंद्र और राजस्थान में कांग्रेस जहां सरकार के खिलाफ हर मौके पर सड़कों पर उतर रही है वहीं कुचामन में सत्ता गंवाने के बाद भी जमीनी स्तर पर विरोध नहीं किया गया।
क्या सत्ता का सुख भोगकर कमजोर हो गई कांग्रेस
विरोध न करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला नगर परिषद का कार्यकाल तीन महीने बाद खत्म होने वाला है। कांग्रेस को भरोसा है कि आगामी चुनाव में जनता फिर से उन्हें चुन लेगी।
दूसरा पांच साल का कार्यकाल लगभग पूरा होने को है ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि अब सत्ता जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। तभी तो निलंबन के पहले ही सभापति ने अपना सरकारी वाहन नगर परिषद को सौंप दिया।
आज बोले चावला – सभापति सिखवाल के शपथग्रहण को बताया काला अध्याय, अपने ऊपर लगे आरोपों को बताया झूठा
आज शनिवार को ही हेमराज चावला द्वारा बयान जारी करते हुए इस मामले में अपनी बात रखी। उन पर सरकारी भूमि का पट्टा बनवाने की शिकायत की गई थी जिस पर उन्होंने कहा कि मुझ पर जिस सरकारी भूमि का पट्टा बनाने का आरोप लगाया जा रहा है वो भूमि मेरे पूर्वजों की पुश्तैनी पट्टाशुद भूमि में से है, जो मेरे हिस्से में आई हुई है और मेरे मकान की चारदीवारी के अंदर ही स्थित है।
यह मात्र 8 फिट भूमि है जिसका फ्री होल्ड पट्टा बनाने का आवेदन कर मैंने निर्धारित पट्टा शुल्क भी जमा कराया था। मैंने किसी भी प्रकार से पट्टा शुल्क की चोरी नहीं की है। जब मैंने अपनी पुश्तैनी पट्टाशुद भूमि का पट्टा बनाया है तो वह भूमि नगरपालिका की कैसे हो सकती है।
वहीं उन्होंने नवनियुक्त सभापति सुरेश सिखवाल के पदभार ग्रहण को कुचामन नगर परिषद के इतिहास का एक काला अध्याय बताया।
उन्होंने कहा कि क्षेत्र के पूर्व विधायक स्व. किशनलाल शाह, स्व. हनुमान सिंह चौधरी, स्व. रामेश्वरलाल चौधरी, स्व. हरीशचंद्र कुमावत आदि ने अपने कार्यकाल में कभी भी किसी चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, पंच या प्रधान को राजनीतिक द्वेषता से हटाने की रुचि नहीं दिखाई। लेकिन आज राजनीतिक दुर्भावना के चलते नियुक्त सभापति के रूप में सुरेश सिखवाल का पदग्रहण कुचामन के इतिहास में एक काले अध्याय की शुरुआत मात्र है।
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आने वाले चुनावों में जनता किसको देगी समर्थन?
जहां प्रदेश स्तर पर कांग्रेस के दिग्गज नेता सड़कों पर उतरकर सरकार का विरोध करते हैं और अपने कार्यकर्ताओं से भी ऐसा करने का आह्वान करते हैं वहीं कुचामन सिटी में सत्ता जाने के बाद कांग्रेस केवल सोशल मीडिया पर बयानबाजी तक सीमित रह गई। दूसरी ओर प्रदेश में बीजेपी की सरकार को दो साल पूरे होने को हैं इसके बावजूद कुचामन नगर परिषद में आखिरी तीन महीनों में ही कांग्रेस से सत्ता छीनी जा सकी।
ऐसे में जनता के सामने यह सवाल खड़ा है कि दोनों पार्टियों की यह स्थिति कमजोरी है या फिर कोई राजनीतिक चालाकी। इसका असली जवाब आने वाले चुनावों में ही सामने आएगा।






