जब से कुचामन में सभापति पद के लिए अनारक्षित सीट सामने आई है। शहर की राजनीति जैसे एक अलग ही दौर में प्रवेश कर गई है। बाहर से भले ही सब कुछ शांत नजर आ रहा हो। लेकिन अंदरखाने सभापति की कुर्सी को लेकर राजनीतिक गणित तेजी से बैठाया जा रहा है।

हर एक राजनीतिज्ञ अपनी 100 प्रतिशत बुद्धि का इस्तेमाल करके इस कुर्सी तक पहुंचने की रणनीति तैयार कर रहा है।

जो निवर्तमान पार्षद हैं। उनकी एक नजर पार्षदी बचाने पर है तो दूसरी नजर सभापति की कुर्सी पर। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना खासा दिलचस्प होगा कि कौन मैदान में उतरता है और कौन किस तरह का राजनीतिक दांव चलता है।
लेकिन कहते हैं ना – एक बार शेर ने खून चख लिया तो आदमखोर हो जाता है। कुछ ऐसा ही इस कुर्सी का मोह है। जिसे एक बार सभापति की कुर्सी मिल गई, उसके लिए दोबारा उसी कुर्सी तक पहुंचने की चाह आसानी से खत्म नहीं होती। कुचामन में भी कुछ ऐसे चेहरे हैं जो पहले इस कुर्सी पर बैठ चुके हैं और अब एक बार फिर मौके की तलाश में दिखाई दे सकते हैं।

सुरेश सिखवाल – कम समय मिला, अब पूरा कार्यकाल?
इनमें एक नाम सुरेश सिखवाल का है। सिखवाल कम समय के लिए सभापति बने थे। ऐसे में चाहत हो सकती है कि इस बार मौका मिले तो पूरा कार्यकाल पूरा किया जाए।
इन दिनों उनकी सक्रियता भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। सरकार का कोई कार्यक्रम हो या शहर से जुड़ा कोई बड़ा आयोजन, उनकी मौजूदगी नजर आ ही जाती है। नगर परिषद के अधिकारियों के बीच भी वे आजकल दिखाई दे जाते हैं। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह चर्चा होना लाजिमी है कि कुर्सी का फीलिंग अभी गई नहीं है और चाहत फिर उसी कुर्सी तक पहुंचने की है।
आसिफ खान – सक्रियता बरकरार
इसी तरह आसिफ खान का नाम भी इस दौड़ में चर्चा से बाहर नहीं किया जा सकता। वे हाइब्रिड प्रक्रिया के जरिए सभापति बने थे और बाद में निलंबित भी हुए। इसके बावजूद उनकी राजनीतिक सक्रियता बनी रही। धरना-प्रदर्शनों से लेकर विभिन्न मुद्दों पर उनकी मौजूदगी लगातार देखने को मिली।
यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आसिफ खान एक बार फिर सभापति की कुर्सी के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करते हैं।
यानी पुराने चेहरों के सपने अभी खत्म नहीं हुए हैं।
महेश रामचंद्रका – समाजसेवा से चुनावी मैदान तक
इन दावेदारों के बीच समाजसेवी और बिल्डर महेश रामचंद्रका का नाम भी चर्चा में है। महेश रामचंद्रका लंबे समय से कुचामन शहर में भामाशाह और समाजसेवी के रूप में सक्रिय रहे हैं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यों में उनकी मौजूदगी लगातार देखने को मिलती रही है।
हालांकि अब बदलते राजनीतिक दौर में उनके चुनावी मैदान में उतरने की चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं। यानी समाजसेवा के बाद अब राजनीति की पिच पर भी वे अपनी पारी शुरू करने की तैयारी में नजर आ रहे हैं।
उनके बड़े भाई अशोक रामचंद्रका भी बीजेपी में हरीश कुमावत के साथ लंबे समय तक सक्रिय रह चुके हैं।
आरिफ खान – कुचामन की राजनीति के चाणक्य
अगर कुचामन की राजनीति में रणनीति और राजनीतिक गणित की बात हो तो आरिफ खान का नाम भी सामने आता है। उन्हें कुचामन की राजनीति का चाणक्य कहा जाता है।
आरिफ खान ने अब तक अपने राजनीतिक अनुभव का परिचय देते हुए पहले खुद पार्षद बनने और उसके बाद अपने भाई आसिफ खान को कांग्रेस से हाइब्रिड प्रक्रिया के जरिए सभापति बनवाने में अहम भूमिका निभाई। खास बात यह रही कि जिस समय आसिफ खान सभापति बने, उस दौरान बहुमत बीजेपी के पास था।
यानी बहुमत किसी और के पास और सभापति की कुर्सी किसी और के खाते में – यह अपने आप में उस समय का बड़ा राजनीतिक खेल था। यही वजह है कि इस बार जब सभापति पद के लिए अनारक्षित सीट सामने आई है तो आरिफ खान की रणनीति और अगली राजनीतिक चाल पर भी सबकी नजर रहेगी।
हेमराज चावला – पहले ही बता चुके हैं मन की बात
इनके अलावा कुचामन की राजनीति में लगातार सक्रिय रहने वाले चेहरों में निवर्तमान उपसभापति हेमराज चावला भी हैं। उन्होंने तो पहले ही अपने मनसूबे जाहिर कर दिए हैं कि इस बार सभापति पद के लिए SC की लॉटरी निकाली जानी चाहिए, ताकि अनुसूचित जाति से कोई सभापति बन सके। शायद वे खुद की बात कर रहे थे।
राजनीतिक तौर पर देखें तो वे लंबे समय से बीजेपी के खिलाफ मुखर नजर आते रहे हैं। बीजेपी के हर मुद्दे पर विरोध दर्ज कराने से लेकर बयान जारी कर उसकी गलतियां गिनाने तक उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।
लेकिन इस बार फिर अनारक्षित सीट आ गई, जिस पर उन्होंने संदेह भी जताया था। हालांकि अब भी वे अपनी जगह सभापति पद के दावेदार के रूप में रखते हैं।
शायद राजनीति में सबसे पहले सपना ही देखा जाता है, फिर उसके लिए समीकरण तलाशे जाते हैं।
बाबूलाल कुमावत – संगठन से सभापति की कुर्सी तक?
एक नाम है बाबूलाल कुमावत का। वर्तमान में बीजेपी के मंडल अध्यक्ष पद पर हैं और लगभग हर राजनीतिक मुद्दे पर सक्रिय नजर आते हैं।
कुमावत समाज के वोटों पर उनकी कितनी पकड़ है, इसका असली परीक्षण तो चुनावी समीकरण बनने के बाद ही होगा। लेकिन अगर पार्षदी बचाने में कामयाब रहते हैं तो सभापति पद के संभावित दावेदारों की सूची में उनका नाम भी शामिल हो सकता है।
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मुकेश कुमावत – कुछ तो सोचकर आए होंगे
इन सबके बीच बीजेपी से कांग्रेस में आने वाले मुकेश कुमावत को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
पिछले कुछ समय से वे भी राजनीतिक चर्चा में रहे हैं। खास बात यह है कि उन्होंने उस बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस का रास्ता चुना, जिससे उनके पिता विधायक रह चुके हैं।
अब राजनीति में कोई फैसला बिना भविष्य के गणित के लिया गया हो, ऐसा जरूरी नहीं।
राजकुमार फौजी – कुमावत समाज से एक और चेहरा
कुमावत समाज से राजनीतिक ताल ठोकने के लिए राजकुमार फौजी भी मैदान में उतरने की तैयारी में नजर आ रहे हैं। राजकुमार फौजी वर्तमान में कुमावत समाज समिति के अध्यक्ष भी हैं।
अब देखना यह होगा कि कुमावत समाज से सामने आने वाले इन चेहरों में से कौन अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर पाता है।
अबकी बार मुकाबला बड़ा होगा
अनारक्षित सीट ने इस बार सबसे बड़ा बदलाव यही किया है कि महिला हो या पुरुष, किसी भी जाति का हो या किसी भी धर्म का – अगर पार्षद बन गया तो सभापति की कुर्सी का सपना देख सकता है।
यही वजह है कि इस बार दावेदारों की संख्या और राजनीतिक समीकरण दोनों बढ़ सकते हैं। पुराने चेहरे अपनी पुरानी जमीन तलाशेंगे, नए चेहरे अपनी राजनीतिक ताकत दिखाएंगे और पार्टियां अपने-अपने समीकरण साधेंगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि कुचामन का अगला सभापति कौन होगा?
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