कुचामन सिटी. प्रदेश के 309 शहरी निकायों में निकाय प्रमुख के पदों के आरक्षण की लॉटरी जयपुर में स्वायत्त शासन विभाग में निकाली जा रही है। इस बार भी कुचामन सिटी की सभापति सीट अनारक्षित यानी सामान्य रही है।

ऐसे में पिछले साल की तरह इस बार भी किसी भी कैटेगरी, चाहे वह जनरल, ओबीसी, एससी या एसटी हो, का उम्मीदवार सभापति पद के लिए चुनाव लड़ सकता है।

सामान्य सीट होने के बाद इस बार भी कुचामन सिटी में चुनावी घमासान बड़ा देखने को मिलेगा। हर समाज, जाति और धर्म का व्यक्ति इस सीट पर दाव लगा सकता है। कई लोग अपनी रणनीतियां भी बना चुके हैं, क्योंकि सभापति की सीट सभी के लिए खुली है और हर कोई इस पर अपनी दावेदारी कर सकता है।
पिछली बार कई बार सत्ता के समीकरणों में परिवर्तन देखने को मिला। कांग्रेस और बीजेपी के बीच सभापति पद को लेकर लगातार खींचतान रही। पिछली बार मुस्लिम समुदाय से ओबीसी सभापति बना, जिसके बाद कार्यकाल के अंतिम समय में सामान्य वर्ग से सभापति बनाया गया। आरोप-प्रत्यारोप, निलंबित सभापति-उपसभापति और मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने के बाद भी स्थिति कई बार बदली। कभी कांग्रेस के पाले में तो कभी बीजेपी के पाले में गेंद जाती रही और सभापति भी बदलता रहा।

इस बार भी सामान्य सीट होने के बाद कई नए समीकरण बनते नजर आएंगे। नई पार्टियां भी इस खेल में तीसरे विकल्प की तरह सामने आ सकती हैं। पिछली बार आरएलपी ने भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इस बार आरएलपी ने कितनी पकड़ बनाई है और वह कितनी ताकत के साथ मैदान में उतरती है, यह भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में कई रणनीतियां बदल सकती हैं और चुनावी खेल बिगड़ भी सकता है।
पिछली बार बीजेपी को बहुमत मिलने के बाद भी कांग्रेस से सभापति बना था। ऐसे में इस बार जनता किसे चुनती है और सभापति की कुर्सी किसके हिस्से में आती है, यह देखना दिलचस्प होगा। सामान्य सीट होने के कारण इस बार भी कुचामन सिटी की राजनीति में बड़ा घमासान देखने को मिल सकता है।
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