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कुचामन सिटी: पुस्तकालय में मनाई मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती, वक्ताओं ने बताई साहित्य की प्रासंगिकता

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कुचामन सिटी. जब तक समाज में शोषण, दमन, अत्याचार, विषमता और सांप्रदायिकता की भावनाएं विद्यमान रहेंगी, तब तक मुंशी प्रेमचंद के विचार उनकी रचनाओं के माध्यम से प्रासंगिक बने रहेंगे।

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ये बातें शहर के श्रीकुचामन पुस्तकालय के संरक्षक गुलाबचंद शर्मा ने कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहीं।

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शहर के पुराने रोडवेज़ बस स्टैंड के पास स्थित श्रीकुचामन पुस्तकालय में शुक्रवार को मुंशी प्रेमचंद जयंती का आयोजन किया गया, जिसमें गुलाबचंद शर्मा ने कहा कि यह दिन हिंदी और उर्दू साहित्य के महान लेखक, उपन्यास सम्राट और ‘कलम के सिपाही’ मुंशी प्रेमचंद के जन्म की याद दिलाता है।

इस दौरान वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य, सामाजिक सरोकारों और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान पर विस्तार से चर्चा की।

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सुरेश वर्मा ने प्रेमचंद के आदर्शों को जीवन में अपनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य मानवीय मूल्यों, सामाजिक न्याय और संवेदनशीलता की सीख देता है।

स्वाधीनता संग्राम में साहित्य की भूमिका

संस्था के अध्यक्ष शिवकुमार अग्रवाल ने कहा कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौर में प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में जागरूकता पैदा करने का काम किया। उन्होंने ‘सोज़-ए-वतन’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘मृतक-भोज’, ‘नमक का दारोगा’, ‘कफन’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘गोदान’ और ‘गबन’ जैसी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों और विसंगतियों को सामने रखा।

सुनील माथुर ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था बल्कि समाज के वंचित और शोषित वर्ग की आवाज़ भी था। उनकी रचनाएं आज भी सामाजिक परिस्थितियों को समझने और बेहतर समाज के निर्माण की प्रेरणा देती हैं।

इस मौके पर कोषाध्यक्ष कालीचरण व्यास ने भी एक कविता सुनाई, जिस पर सभी ने उनका स्वागत किया।

भंवरलाल पारीक ने कहा कि प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने साहित्य को केवल अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, छोटे व्यापारियों और समाज के वंचित वर्गों के संघर्षों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उनकी भाषा सरल, सहज और आम बोलचाल की थी, जिसके कारण उनकी रचनाएं गांव-गांव तक पहुंचीं। यही कारण है कि उन्हें ‘उपन्यास सम्राट‘ और ‘कलम के सिपाही’ कहा जाता है।

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