Tuesday, April 21, 2026
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कुचामन सिटी: पार्षद के घर से बीआर खोखर स्कूल तक, वार्ड 20 की सड़कों पर गंदगी ही गंदगी

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कुचामन सिटी. भारत सरकार द्वारा पूरे देश में स्वच्छ भारत मिशन के तहत स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर विशेष अभियान चलाया गया है। राजस्थान में वर्ष 2019 से 2024 तक इस मिशन पर करीब 18,000 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं।

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इसके बावजूद कुछ शहरों की स्थिति आज भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है।

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बड़ी शर्म की बात यह है कि कुचामन सिटी को भी उन शहरों में गिना जा सकता है, जहां अपशिष्ट निस्तारण व्यवस्था लगभग शून्य है।

स्थिति इतनी खराब है कि यहां शहर की अन्य जगहों को तो छोड़िए, स्कूलों तक के पास कीचड़ और गंदगी का अंबार लगा हुआ है। हाल ही में सामने आई एक तस्वीर ने हालात की हकीकत को उजागर कर दिया है। बीआर खोखर स्कूल के पास नालियों की सफाई के नाम पर निकाला गया कीचड़ सीधे सड़क पर छोड़ दिया गया। यह न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि स्कूल में पढ़ने वाले मासूम बच्चों की सेहत पर भी गंभीर खतरा बन गया है।

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स्कूल खुलने के बाद हर रोज सैकड़ों बच्चे इसी रास्ते से गुजरते हैं। सड़क पर जमा यह गंदा कीचड़ न केवल रास्ता अवरुद्ध करता है, बल्कि उसमें से उठती बदबू और बीमारियों के कीटाणु बच्चों की सेहत पर सीधा हमला कर रहे हैं। ऐसे हालात में यह सवाल उठता है कि क्या यही है ‘स्वच्छ भारत’ का सच?

पूरे वार्ड नंबर 20 में ऐसे ही हालात

वार्ड नंबर 20 के निवासियों का कहना है कि इस समस्या को लेकर कई बार नगर पालिका को शिकायतें की गई हैं, लेकिन सफाईकर्मियों की लापरवाही और ठेकेदार की उदासीनता के कारण कोई सुधार नहीं हुआ।

यह स्थिति नई नहीं है, बल्कि काफी समय से ऐसा ही हो रहा है- नाली की सफाई के बाद निकाला गया कीचड़ पूरी सड़क पर जगह-जगह ढेर लगाकर छोड़ दिया जाता है, जिसे हटाने के लिए कोई नहीं आता।

बारिश और तेज हवाओं के मौसम में नालियों की बदबू सीधे घरों तक पहुंचती है, जिससे लोगों को दरवाजे-खिड़कियां तक बंद रखने पड़ते हैं।

ऐसे हालात हर घर के सामने हैं – वार्ड 20 के पार्षद छीतरमल कुमावत के घर के पास भी ऐसी ही स्थिति है।

सवाल उठते हैं…
सवाल यह उठता है कि क्या नगर परिषद की इन पर कोई पकड़ नहीं है?
क्या ठेकेदार और सफाईकर्मी बिना किसी डर के ऐसे काम कर रहे हैं?

नगर परिषद की साधारण सभा की बैठकों में इस मुद्दे पर चर्चा जरूर होती है, लेकिन कोई ठोस फैसला या कार्रवाई नहीं की जाती। नतीजा यह है कि आमजन को हर दिन इस गंदगी और लापरवाही का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

सरकार की ओर से सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए हर साल करोड़ों रुपए का बजट जारी किया जाता है।

डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण, नई गाड़ियां और सफाई अभियानों के नाम पर योजनाएं शुरू की जाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है।

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