कुचामन सिटी: नगर परिषद के 45 वार्डों के परिणाम सामने आते ही शहर की सियासत में हलचल तेज हो गई है। चार दशक से अधिक समय तक निकाय की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली भाजपा इस बार 15 सीटों पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस 17 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। लेकिन असली कहानी इन दोनों आंकड़ों के बीच छिपी है।
13 निर्दलीय पार्षदों ने चुनावी गणित को ऐसा उलझाया है कि बहुमत का रास्ता अब किसी एक पार्टी के लिए सीधा नहीं रहा बहुमत के लिए 23 पार्षद चाहिए। कांग्रेस को 6 और भाजपा को 8 पार्षदों की जरूरत है। ऐसे में आने वाले दिन कुचामन की राजनीति के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।

और यहीं से शुरू होता है असली खेल…
दिग्गजों के गढ़ में भी नहीं चली राजनीतिक विरासत
इस चुनाव ने सिर्फ सीटों का गणित नहीं बदला, बल्कि कई स्थापित राजनीतिक चेहरों और विरासतों को भी चुनौती दी है।

विधायक, पूर्व पालिकाध्यक्ष एवं भाजपा के कद्दावर नेता रहे स्व. हरीश कुमावत के पुत्र भाजपा के राजेन्द्र कुमावत चुनाव हार गए। वहीं भाजपा के पूर्व पालिकाध्यक्ष एवं वरिष्ठ नेता राधेश्याम गट्टाणी के पुत्र रवि गट्टाणी को भी हार का सामना करना पड़ा। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व उप सभापति एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष निकाय राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हेमराज चावला भी चुनाव जीत नहीं सके।
इन नतीजों ने यह संकेत जरूर दिया है कि इस बार मतदाताओं ने नाम, राजनीतिक विरासत और पुराने प्रभाव से ज्यादा स्थानीय समीकरणों और अपने पसंदीदा प्रत्याशी को तरजीह दी।
कह सकते हैं कि कुचामन में इस बार राजनीतिक विरासत की चमक पर जनता का वोट भारी पड़ा।
भाजपा: सत्ता में सरकार, लेकिन शहर में वोट क्यों नहीं?
भाजपा के लिए यह चुनाव कई सवाल छोड़ गया है। केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होने के बावजूद नगर परिषद में पार्टी महज 15 सीटों पर रह गई। टिकट वितरण को लेकर असंतोष, स्थानीय स्तर पर गुटबाजी और संगठन-सत्ता के बीच खींचतान को हार के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।
सत्ता यानी राज्यमंत्री विजय सिंह चौधरी और भाजपा संगठन यानी जिलाध्यक्ष सुनीता रांदड़, से जुड़े खेमों के बीच टिकट वितरण को लेकर अलग-अलग पसंद और रणनीति की चर्चा चुनाव के दौरान रही।
प्रत्याशी तक नहीं मिले!
भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि लंबे समय तक निकाय की राजनीति में प्रभावी रहने के बावजूद करीब आधा दर्जन वार्डों में पार्टी को प्रत्याशी तक नहीं मिल पाने की स्थिति क्यों बनी? यह आंकड़ा केवल चुनावी कमजोरी नहीं बताता, बल्कि संगठन की जमीनी स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
ये मुद्दे जो बने भाजपा की हार के कारण
शहर में सड़क, नाली, सफाई और सीवरेज जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर असंतोष भी चुनावी परिणामों में दिखाई दिया।
सरकार भाजपा की होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर अपेक्षित विकास नहीं होने की शिकायतें पार्टी के लिए परेशानी का कारण बनीं।
संगठन के भीतर भी यह चर्चा रही कि जब सत्ता अपने हाथ में है तो आम कार्यकर्ता और समर्थकों के काम क्यों नहीं हो रहे?
सत्ता और संगठन के बीच बढ़ती दूरी ने क्या भाजपा के वोट को प्रभावित किया? यह सवाल अब पार्टी के सामने है।
आखिरी साल का फैसला भी पड़ा भारी?
कांग्रेस के सभापति आसिफ खान को हटाकर सुरेश सिखवाल को कार्यवाहक सभापति बनाए जाने का फैसला भी भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह माना जा रहा है।
आसिफ खान पूरे कार्यकाल में भाजपा और विरोधियों के निशाने पर रहे। कोर्ट के आदेश और राज्य सरकार के प्रभाव के बीच आखिरी साल में उन्हें सभापति की कुर्सी गंवानी पड़ी।
लेकिन चुनाव परिणाम ने यह भी दिखा दिया कि किसी राजनीतिक फैसले का असर केवल तत्कालीन सत्ता समीकरण तक सीमित नहीं रहता।
कांग्रेस: सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से दूर
कांग्रेस के लिए परिणाम राहत देने वाले जरूर हैं। 17 सीटों के साथ पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। भाजपा से दो सीट अधिक हासिल करना कांग्रेस की चुनावी रणनीति की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।
टिकट वितरण में महेंद्र चौधरी की रणनीति काम आई!
कांग्रेस में टिकट वितरण को लेकर महेंद्र चौधरी की रणनीति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जहां भाजपा को कई वार्डों में प्रत्याशी संकट का सामना करना पड़ा, वहीं कांग्रेस लगभग सभी वार्डों में प्रत्याशी उतारने में सफल रही। इसका फायदा उसे सीटों के रूप में मिला। 17 सीटों के साथ कांग्रेस अब बोर्ड बनाने की दौड़ में सबसे आगे खड़ी दिखाई दे रही है।
लेकिन…आगे खड़ी है, मंजिल तक पहुंची नहीं है।
कांग्रेस के पिछले बोर्ड की छाया अभी बाकी
पिछले बोर्ड को लेकर कांग्रेस भी पूरी तरह सवालों से मुक्त नहीं है। आसिफ खान के कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते रहे। पूरे कार्यकाल में अफसरशाही के हावी रहने और अपेक्षित विकास कार्य नहीं होने की शिकायतें भी सामने आती रहीं। इन आरोपों की राजनीतिक और कानूनी स्थिति अलग-अलग विषय है, लेकिन इतना जरूर है कि जनता ने कांग्रेस को भी स्पष्ट बहुमत देकर पूरी तरह समर्थन नहीं दिया। यही वजह है कि कांग्रेस की 17 सीटों वाली जीत को भी जनता की खुली स्वीकृति के बजाय भाजपा से बेहतर प्रदर्शन के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
13 निर्दलीय: चुनाव के असली किंगमेकर!
इस चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर अगर कोई है तो वह है निर्दलीयों का प्रदर्शन। 45 वार्डों में 13 निर्दलीयों का जीतना सामान्य आंकड़ा नहीं है। हर तीसरे-चौथे वार्ड के आसपास एक निर्दलीय का जीतकर आना बताता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने पार्टी के चुनाव चिन्ह से हटकर स्थानीय प्रत्याशी को चुना। यानी जनता ने कहा कि “पार्टी बाद में, हमारा उम्मीदवार पहले।” और अब यही 13 पार्षद कुचामन नगर परिषद की सत्ता के सबसे महत्वपूर्ण किरदार बन गए हैं।
जनता का संदेश: दोनों पार्टियों को आईना
इस चुनाव को केवल भाजपा की हार या कांग्रेस की जीत के रूप में देखना शायद अधूरा होगा। असल संदेश इससे कहीं बड़ा है। जनता ने किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। भाजपा को 15, कांग्रेस को 17 और निर्दलीयों को 13 सीटें देकर मतदाताओं ने दोनों प्रमुख दलों को संदेश दिया है कि सत्ता पर दावा करने से पहले जनता का विश्वास जीतना जरूरी है वंशवाद, राजनीतिक विरासत और थोपे गए टिकटों को लेकर भी मतदाताओं ने कई वार्डों में अपना अलग फैसला सुनाया। दिग्गजों के परिजनों की हार इसी बदले हुए राजनीतिक मूड की ओर संकेत करती है।
… अब सबसे बड़ा सवाल: बोर्ड किसका?
अब आते हैं सबसे दिलचस्प गणित पर।
बहुमत का आंकड़ा—23
कांग्रेस—17
भाजपा—15
निर्दलीय—13
कांग्रेस को बहुमत के लिए 6 निर्दलीयों की जरूरत है। भाजपा को 8 निर्दलीयों की कागज पर कांग्रेस थोड़ी आगे है। लेकिन राजनीति में कागज के आंकड़े हमेशा अंतिम नहीं होते।
नावां नगर पालिका चुनाव: सभी 25 वार्डों के परिणाम घोषित, जानिए किस वार्ड से कौन जीता
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि – क्या अपने ही पार्षद संभाल पाएंगी भाजपा-कांग्रेस? यही इस चुनाव का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है मान लीजिए कांग्रेस ने 6 निर्दलीयों को अपने साथ कर लिया और भाजपा ने भी अपने 15 पार्षदों को एकजुट रखा – तो कांग्रेस बोर्ड बना सकती है। लेकिन अगर निर्दलीयों के साथ-साथ क्रॉस वोटिंग का खेल शुरू हुआ तो पूरा गणित बदल सकता है। कुचामन की निकाय राजनीति में क्रॉस वोटिंग और पार्षदों के पाला बदलने की चर्चाएं नई नहीं हैं इसलिए इस बार सिर्फ निर्दलीयों की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं है। भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने पार्षदों को कितनी मजबूती से साथ रख पाती हैं, यह भी बोर्ड गठन में निर्णायक होगा।
डीडवाना-कुचामन की 5 नगर पालिकाओं में भाजपा का दबदबा, 65 वार्डों में जीत
… और अब शुरू होगी असली ‘बाड़ेबंदी’ की राजनीति?
चुनाव परिणाम आने के साथ ही अब निगाहें उन 13 निर्दलीयों पर टिक गई हैं। कौन किसके संपर्क में है? किसे किसका समर्थन मिलेगा? कौन सभापति के लिए दावेदार होगा? और सबसे बड़ा सवाल— क्या निर्दलीय किसी एक दल के साथ जाएंगे या अपनी अलग रणनीति बनाएंगे? राजनीतिक हलकों में आने वाले दिनों में इन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे।
अब देखना यह है कि… 17 वाली कांग्रेस 6 का आंकड़ा जुटा पाती है, 15 वाली भाजपा 8 निर्दलीयों को अपने साथ ला पाती है या 13 निर्दलीय मिलकर कुचामन की राजनीति में कोई तीसरी पटकथा लिख देते हैं कुचामन ने चुनाव में अपना फैसला सुना दिया है। अब बारी राजनीति की है। क्योंकि इस बार चुनावी ऊंट किसी एक तरफ नहीं बैठा है। उसकी करवट तय करने वाले 13 निर्दलीय पार्षद हैं।







