कुचामन सिटी में फिर वादों का दौर आ गया है। जगह-जगह सभाएं हो रही हैं। पूर्व पार्षद अपने कार्यकाल में किए गए कामों का व्याख्यान लोगों के सामने कर रहे हैं, तो वहीं जो प्रत्याशी पार्षद बनने की चाह रखते हैं। वे जीत के बाद किस तरह जनसेवा करेंगे, इसका ऐलान कर रहे हैं।
चुनाव की एक बात खास है। जिस शहर के बिगड़ते हालातों को पिछले कई साल तक नजरअंदाज किया गया, जहां लोगों को अपना काम करवाने के लिए न्यायालय तक जाना पड़ा। आज उसी शहर के विकास की बातें हर एक वार्ड में हो रही हैं। उन टूटी सड़कों और जर्जर भवनों को याद किया जा रहा है जिन्हें सालों तक नजरअंदाज किया गया।

जैसे कि ऊपर लगी तस्वीर में नगर परिषद के सामने सड़क का निर्माण कार्य चल रहा है। इस सड़क को कई सालों तक किसी ने पूछा तक नहीं। जैसे श्राद्ध में कौए याद आते हैं, वैसे ही चुनाव में इस सड़क के गड्ढे भी याद आ गए। जिन गड्ढों की वजह से लोग इस सड़क को कोसते रहे। आज ये गड्ढे भी बोल सकते हैं – ” अपना टाइम आ गया।”
वोट की पावर
चुनाव प्रचार में प्रत्याशी दिन-रात जुटे हुए हैं। डीजे पर जोर-शोर से बजाया जा रहा है कि किस सिंबल पर वोट डालना है। जिन वार्डवासियों को इतने सालों तक पूछा तक नहीं गया। आज उन्हीं को सभाओं में, उनके घर-घर जाकर हाथ जोड़कर बुलाया जा रहा है। उनका सम्मान किया जा रहा है। आखिर एक वोट काफी कीमती होता है।

जिस वार्डवासी को सामान्य दिनों में अपनी समस्या बताने के लिए कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। आज वो एक कॉल कर रहा है, जिस पर सीधे अधिकारियों तक तुरंत उसकी समस्या पहुंच रहे हैं। एक वोट के लिए हाथ जोड़ रहे हैं, पैर छू रहे हैं, सम्मान कर रहे हैं और भरोसा दिला रहे हैं कि चुनाव जीतते ही सबसे पहले उनकी समस्या का समाधान होगा।
लाखों रुपए के वादे
ये एक वोट की पावर ही है कि लाखों रुपए के वादे किए जा रहे हैं – नए भवन निर्माण के लिए, सड़कों के लिए, सफाई व्यवस्था के लिए और वार्ड के विकास के लिए। लेकिन सब कुछ चुनाव के बाद।
दिलचस्प बात यह है कि ये वादे बदले नहीं हैं। वादे वही हैं, मुद्दे वही हैं और कई समस्याएं भी वही हैं जो पिछले चुनाव में थीं।
फर्क सिर्फ इतना है कि तब जनता इन समस्याओं के साथ थी और अब चुनाव के समय प्रत्याशी भी उन्हीं समस्याओं के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
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