Monday, March 30, 2026
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कुचामन सिटी: अरावली संरक्षण को लेकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन, आंदोलन की चेतावनी

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कुचामन सिटी. प्राचीन अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर शहर में जनआंदोलन की शुरुआत हो गई है। इस गंभीर पर्यावरणीय मुद्दे पर भगतसिंह यूथ ब्रिगेड और विश्व जाट महासभा सहित सामाजिक संगठनों व राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने कड़ा रुख अपनाते हुए राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा है।

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ज्ञापन में केंद्र सरकार की उस सिफारिश पर आपत्ति जताई गई है। जिसमें अरावली को केवल 100 मीटर ऊंचाई तक सीमित परिभाषित करने की बात कही गई है। इसे जनहित के विरुद्ध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर पुनर्विचार और अरावली को पूर्ण कानूनी संरक्षण देने की मांग की गई।

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100 मीटर की परिभाषा पर कड़ा ऐतराज

प्रदेश अध्यक्ष एवं विश्व जाट महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष परसाराम बुगालिया और तहसील अध्यक्ष झूमरमल बिजारणिया के नेतृत्व में सोमवार को बड़ी संख्या में पर्यावरण प्रेमियों ने उपखंड अधिकारी को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। बताया गया कि नई परिभाषा लागू होने से अरावली का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा, जो पर्यावरण के लिए गंभीर और दूरगामी दुष्परिणाम ला सकता है।

अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, देश की ढाल है

कार्यकर्ताओं ने कहा कि अरावली केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। यह थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने, धूल भरी आंधियों से बचाव करने और भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभाती है। संरक्षण कमजोर होने पर खनन गतिविधियां बढ़ेंगी, जिससे जलस्तर, जैव विविधता और वायु गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ेगा। दिल्ली-एनसीआर सहित पश्चिमी भारत में प्रदूषण बढ़ने की आशंका है।

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ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो बड़ा आंदोलन

ज्ञापन में चेतावनी दी गई कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। इस अवसर पर कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष भंवरअली, जिला उपाध्यक्ष शेरखान, पूर्व उपसभापति हेमराज चावला, वरिष्ठ कांग्रेसी दुर्गाराम चौधरी, पार्षद मोहम्मद फारूक टाक सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी उपस्थित रहे।

प्रदेश अध्यक्ष परसाराम बुगालिया ने कहा कि अरावली संरक्षण का विषय केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि राष्ट्र की दीर्घकालिक सुरक्षा से जुड़ा है। अरावली कमजोर हुई तो इसके दुष्परिणाम राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर-पश्चिम भारत को झेलने पड़ेंगे।

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