कुचामन सिटी जो कभी अपनी चौड़ी सड़कों, साफ गलियों और सुनियोजित बाजारों के लिए जाना जाता था, आज दम तोड़ते शहर की तस्वीर बन चुका है। शहर का फैलाव भले बढ़ रहा हो जगह-जगह बड़ी बिल्डिंगें और मॉल्स बन रहे हों लेकिन रास्ते सिकुड़ रहे हैं।


शिक्षा नगरी कुचामन की यह तस्वीर अब आस-पास के अन्य शहरों जैसी होती जा रही है जहां हर चौराहा, हर गली और हर मोड़ संकरा बनता जा रहा है। लेकिन यह सब किसी भविष्यवाणी का परिणाम नहीं बल्कि कुचामन की नगर परिषद की लापरवाही और भ्रष्ट व्यवस्था की देन है।


कुचामन नगर परिषद का हाल कुछ यूँ है –
जब सड़क पर जनता फँसती है तो परिषद मीटिंग में कार्रवाई का आश्वासन देती है। जब ठेले रातभर सड़कों पर खड़े रहते हैं, तो अधिकारी अभियान की तैयारी में लगे होते हैं। और जब मीडिया सवाल पूछता है, तो वही पुराना रटा-रटाया जवाब मिलता है – “हम लगातार अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कर रहे हैं…” मगर असल में कार्रवाई होती है फोटो सेशन। अतिक्रमण हटता है कैमरे के सामने, और फिर सब कुछ वापस पहले जैसा हो जाता है।
अक्सर नगर परिषद के नाम पर अतिक्रमण हटाओ अभियान की खबरें छपती हैं। शहर में दिखावटी कार्रवाई होती है। जो ठेले हटाए जाते हैं, जिन मॉल्स पर नोटिस चिपकाया जाता है वे अगले ही दिन वहीं लौट आते हैं। और मॉल्स पर लगे नोटिस धरे के धरे रह जाते हैं।

कभी बसों को हटाने की बात होती है, कभी भारी वाहनों पर जुर्माने की।
लेकिन सवाल यह है –
क्या कुचामन में अतिक्रमण सिर्फ बसों और ट्रकों से हो रहा है? अगर जवाब हाँ है, तो शायद नगर परिषद ने कभी अपनी आँखें खोली ही नहीं। असल अतिक्रमण की जड़ें शहर के बीचोंबीच हैं – जिनके बारे में Kuchamadi News चैनल अपनी कई खबरों में बता चुका है।
इनमें बड़े शॉपिंग मॉल्स और कॉम्प्लेक्स शामिल हैं, जिनके पास पार्किंग नहीं है; प्राइवेट अस्पताल जिनके बाहर मरीजों के वाहन सड़क पर खड़े हैं; मेडिकल स्टोर्स के आगे ठेले और दुकानों के आगे कब्ज़े हैं। यही वो तस्वीर है जो कुचामन को संकरा शहर बना रही है।
नगर परिषद इन पर कार्रवाई क्यों नहीं करती?
क्योंकि जहाँ पैसा बहता है, वहाँ कानून सच में अंधा बन जाता है। यहाँ अतिक्रमण हटाने से ज़्यादा जरूरी काली कमाई बचाने का इंतज़ाम है। अगर किसी को नगर परिषद की निष्क्रियता का प्रत्यक्ष उदाहरण देखना है तो बस बालाजी बाजार चला जाए। यह इलाका अब व्यापारिक केंद्र से ज़्यादा कब्ज़ा केंद्र बन चुका है। यहाँ हर दुकानदार अपनी दुकान से पाँच-छह फीट बाहर तक सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर चुका है।

इतना ही नहीं, कई व्यापारी अपनी दुकान के बाहर ठेले वालों को जगह किराए पर देकर कमाई भी कर रहे हैं। सरकारी ज़मीन पर किराया निजी जेब में जा रहा है। इसे कहते हैं कानूनी चोरी, जो नगर परिषद की नाक के नीचे हर दिन होती है। परिषद के अधिकारी इस दृश्य से ऐसे गुजरते हैं जैसे अंधेरे में धूप खोज रहे हों।
राहगीरों के लिए यह रास्ते किसी परीक्षा से कम नहीं। हर दिन झगड़े होते हैं, हर हफ्ते दुर्घटनाओं में कोई मरता है, कई घायल होते हैं, और हर बार वही बहाना – “अतिक्रमण हटवाया जाएगा।” लेकिन हटता कुछ नहीं, क्योंकि नगर परिषद के अभियानों का असर सिर्फ मीडिया कवरेज तक सीमित है।
बालाजी बाजार की गलियों में ज़रा घूम लीजिए, आपको समझ आ जाएगा कि कुचामन में कानून और ठेले दोनों एक ही जगह खड़े हैं।
और यह समस्या सिर्फ एक बाजार की नहीं, शहर के हर कोने में यही हाल है। शाह जी का बगीचा से नोबल स्कूल तक लोडिंग पिकअप और ऑटो ऐसे खड़े हैं मानो यहीं उनका घर हो। सत्संग भवन की गली में नावां–मकराना की टैक्सियाँ हर वक्त खड़ी मिलेंगी। धोबी मोहल्ला से बस स्टैंड मार्ग तक ठेले रात-दिन स्थायी हो चुके हैं।



रमा देवी सारड़ा मार्ग जो मुश्किल से 15 फुट चौड़ी सड़क है, वहाँ एक साइड से ठेले इस कदर जमे हैं कि राहगीर को साँस लेने की भी जगह नहीं बचती। कई बार बाइक सवार इस रास्ते से गुजरते हुए हादसे का शिकार होते हैं।

राजपूत हॉस्टल की गली में नो पार्किंग बोर्ड है लेकिन वहीं टैक्सी स्टैंड भी। शिव हॉस्पिटल से लेकर गोल प्याऊ तक दुकानदारों ने फुटपाथों पर कब्ज़ा कर रखा है। अब कुचामन में नो पार्किंग नहीं, बल्कि सब पार्किंग के बोर्ड लगा देने चाहिए।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि नगर परिषद इन सबकी नियंत्रक है, लेकिन असल में वही अव्यवस्था की संचालक बन चुकी है। नो वेंडर ज़ोन में ठेले स्थायी हैं, नो पार्किंग ज़ोन में टैक्सी स्टैंड हैं, और “सार्वजनिक सड़कें” अब निजी दुकानों का हिस्सा बन चुकी हैं। कह सकते हैं — कुचामन की सड़कें अब जनता की नहीं, जुगाड़ की हो गई हैं। लोग चंद पैसों के लिए आमजन को परेशान कर रहे हैं।
इस अराजकता से परेशान लोग अब खुद समाधान सुझा रहे हैं –
वे कहते हैं सड़कों पर लाइनिंग बनाओ, पार्किंग ज़ोन और नो पार्किंग ज़ोन तय करो, कॉम्प्लेक्स की पार्किंग अनिवार्य करो, वन-वे सिस्टम लागू करो, यातायात पुलिस बढ़ाओ और गलत पार्किंग वाली गाड़ियों को टो करो। लेकिन ये सब सुझाव उसी फाइल में पड़े हैं, जहाँ से पिछले दस सालों से योजना निर्माण शुरू ही नहीं हुआ।

कुचामन की जनता अब यह सवाल पूछने लगी है-
क्या हमारा शहर वाकई शहर है या अब बस एक बस्ती बन चुका है? क्या नगर परिषद सिर्फ टैक्स वसूलने और अभियान की फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गई है? क्या अतिक्रमण हटाने का मतलब सिर्फ गरीब ठेलेवालों तक ही सीमित है? और अगर हाँ, तो फिर कुचामन की गलियाँ आने वाले वक्त में सिर्फ जाम, झगड़े और जुर्माने की पहचान बनकर रह जाएँगी।







