कुचामन सिटी. पश्चिमी राजस्थान लंबे समय से शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु की दोहरी चुनौती तथा पेयजल में फ्लोराइड प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। इस क्षेत्र में वार्षिक औसत वर्षा मात्र 30 से 40 सेंटीमीटर के आसपास है, जिसके कारण ताजे और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता लगातार संकटग्रस्त बनी हुई है।


भूजल स्तर में निरंतर गिरावट और उसमें उच्च मात्रा में फ्लोराइड की उपस्थिति ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है, जिससे क्षेत्र की जनसंख्या को स्वास्थ्य, पर्यावरणीय तथा सामाजिक-आर्थिक स्तर पर गंभीर नुकसान उठाना पड़ रहा है।

नागौर जिला जो इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है, को अक्सर ‘कुबड़ पट्टी’ या ‘बांका पट्टी’ कहा जाता है — क्योंकि यहां लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से लोगों में हड्डियों के विकार (skeletal deformities) और दंत फ्लोरोसिस जैसी बीमारियाँ आम हैं। फ्लोराइड की अधिकता न केवल स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि आर.ओ. संयंत्रों (RO Plants) के बार-बार खराब होने का भी प्रमुख कारण बनती है, जिससे स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता और कठिन हो जाती है।


इसी गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिवाजी कॉलेज ने HEFA-CSR परियोजना के अंतर्गत “नागौर जिले की ‘कुबड़ पट्टी’ क्षेत्र में जल और मिट्टी की सूक्ष्मजीव विविधता का मूल्यांकन तथा पेयजल की उपयोगिता के लिए इसके सुधारात्मक उपाय” शीर्षक से एक अनुसंधान परियोजना प्रारंभ की है।
दिनांक 27 अक्टूबर से 2 नवंबर 2025 के बीच परियोजना दल ने नागौर जिले के विभिन्न क्षेत्रों — डीडवाना, लाडनूं, कुचामन, नावा, मकराना, डेगाना आदि कई गांवों — का दौरा किया। इस दौरान टीम ने अलग-अलग स्थानों से जल एवं मिट्टी के नमूने एकत्र किए और स्थानीय निवासियों से जल उपयोग, उपलब्धता और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भी प्राप्त की।
इस परियोजना का उद्देश्य अध्ययन क्षेत्र के 15 विभिन्न स्थानों से जल के भौतिक और रासायनिक गुणों का विश्लेषण करना है, जिससे भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के अनुसार जल की गुणवत्ता का मूल्यांकन किया जा सके और इसके स्थानीय समुदाय पर प्रभावों को समझा जा सके।
परियोजना का प्रारंभिक पायलट सर्वेक्षण वर्तमान में शिवाजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. वीरेन्द्र भारद्वाज के दूरदर्शी नेतृत्व में तथा कॉलेज के उप-प्राचार्य एवं परियोजना के मार्गदर्शक प्रो. तेजबीर सिंह राणा के निर्देशन और परामर्श में किया जा रहा है। परियोजना दल का नेतृत्व डॉ. भारत रत्नू (प्रधान अन्वेषक) कर रहे हैं, जबकि डॉ. अंकिता दुआ और डॉ. ऐशना निगम सह-प्रधान अन्वेषक हैं। परियोजना में अनुसंधान सहयोगी डॉ. यतेन्द्र शर्मा भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
सर्वेक्षण के उपरांत दल जल एवं मिट्टी के भौतिक-रासायनिक विश्लेषण (Physiochemical Analysis) करेगा, जिसके बाद मेटाजीनोम सिक्वेंसिंग (Metagenome Sequencing) तकनीक के माध्यम से नमूनों में उपस्थित सूक्ष्मजीव विविधता का अध्ययन किया जाएगा। इस अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य ऐसे सूक्ष्मजीवों, जीनों या जीन क्लस्टरों की पहचान करना है, जिनमें फ्लोराइड के जैव-संचयन (Bioaccumulation) की क्षमता हो और जो प्राकृतिक रूप से पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा को कम कर सकें।
“यह परियोजना केवल एक वैज्ञानिक अध्ययन नहीं, बल्कि राजस्थान की एक दीर्घकालिक जल समस्या के लिए टिकाऊ समाधान की दिशा में एक ठोस कदम है,” डॉ. भारत रत्नू ने कहा। “हमारी खोजें नीतिगत रणनीतियों और नवीन जैव-प्रौद्योगिकी समाधानों के निर्माण में सहायक होंगी, जिससे क्षेत्र में सुरक्षित पेयजल और बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जा सके।”
इस परियोजना का दीर्घकालिक उद्देश्य वैज्ञानिक निष्कर्षों को व्यावहारिक और नीतिगत उपायों में रूपांतरित करना है, ताकि राजस्थान के फ्लोराइड प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में सततता (Sustainability) और स्वास्थ्य सुरक्षा (Health Security) सुनिश्चित की जा सके।






