कुचामन सिटी. गोलमाल मूवी देखी है? अच्छी है। देखना, लेकिन उससे पहले कुचामन सिटी के सरकारी कर्मचारियों की बनाई गोलमाल के किस्से सुनते हुए जाओ। जनता की जेब काटते-काटते सरकार की जेब पर भी हाथ साफ कर ही लेते हैं। क्या करें, आदत ही हो गई है बेईमानी करने की।


चलिए, ऐसे इनके गुणगान करने से क्या ही होगा। कारनामे बताते हैं :-

इस बार पकड़ में आई है सरकारी बसों के संचालकों के साथ-साथ अधिकारी-कर्मचारियों और प्राइवेट बस संचालकों की मिलीभगत।
अब प्राइवेट बस संचालकों ने अपनी बसें सड़क पर तो उतार लीं। हालांकि जब सरकार रोडवेज चला रही है जिसमें कम किराए में यात्रा की जा सकती है। फिर प्राइवेट बसों में बैठेगा कौन?

यहीं से शुरू होता है प्लान :-
पहली कड़ी: रोडवेज बस संचालकों को अपनी तरफ करना
एक काम करते हैं। बसें सरकार थोड़ी चलाती है। इनका पूरा कंट्रोल ड्राइवर और कंडक्टर के पास होता है। ऐसे में अगर उनको अपनी योजना में शामिल कर लिया जाए तो कितना अच्छा होगा।
प्राइवेट बस संचालक जाता है और कहता है कि “देख भाई, एक प्लान बनाया है। दोनों का फायदा है एक बार सुन ले।”

“देख, प्लान ऐसा है कि तुझे बस अपनी गाड़ी को वहां नहीं रोकना जहां ज्यादा यात्री दिखें। चुपचाप निकलकर नए वाले बस स्टैंड पर खड़ी कर देना।
आगे हम संभाल लेंगे। कुछ ही देर में हमारी बस वहां से निकलेगी। लेट होने वाले लोगों को प्राइवेट गाड़ी में बैठना पड़ेगा। किराया भी अच्छा-खासा देना पड़ेगा।”
सरकारी वाला कहता है, “योजना तो अच्छी है, पर मेरा क्या फायदा?”
“अरे, एक तरफ से सरकार तुझे हर महीने तनख्वाह दे रही है। ऊपर से हम भी अपनी तरफ से तेरा सहयोग करेंगे।”
“लेकिन जनता का क्या होगा?”
“ये पकड़ पैसे, अब सब ठीक है।”
सरकारी वाला कहता है, “उन बड़े लोगों का क्या? वो छोटा-मोटा सहयोग नहीं लेते।
रोज-रोज गाड़ी खाली जाएगी तो उनको तुरंत पता चल जाएगा फिर क्या करोगे?”
दूसरी कड़ी: सरकारी कर्मचारियों के साथ सिस्टम सेट करना
सिस्टम की कड़ी हमेशा ऊपर से शुरू होती है। उन्हें अपनी तरफ करना है। अब प्राइवेट वाले जाते हैं।
“सर, एक आइडिया है। ऐसे-ऐसे करेंगे, ये-ये होगा, सब साथ मिलकर गेम बजा देंगे।”

“अरे, मरवाएगा क्या? स्थायी लोक अदालत मेड़ता कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सभी बसें पुराने बस स्टैंड से संचालित की जाएंगी। मुख्य प्रबंधक का भी आदेश आया है। कुचामन कस्बे में संचालित हो रही निगम की सभी बसों को कुचामन सिटी के पुराने बस स्टैंड से संचालित करने के लिए चालक और परिचालक दोनों को पाबंद किया गया है कि यात्रियों को वहीं से चढ़ाना-उतारना है और नियमानुसार टिकट भी जारी करना है। अगर ऐसा नहीं किया तो कार्रवाई भुगतनी पड़ेगी।”
ऐसे में कुछ नहीं कर पाएंगे, ही बोलने वाला था कि
तभी संदेश आया – “आपके बैंक खाते में रुपए प्राप्त हुए।”
बस फिर क्या था। कौन-सा आदेश कब आया, कहां आया, सब भूल गए। जहां से बस ले जानी है, वहां से ले जा सकते हैं।
ये प्लान लागू होने के बाद रोडवेज बसें खाली जाने लगीं। देखा जा सकता है कि काफी बसें कुचामन के पुराने बस स्टैंड पर रुकती ही नहीं, बल्कि कुचामन के बाहर से निकल जाती हैं। लोगों को प्राइवेट बसों में बैठने के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ता है।
आस-पास के गांवों से रोज लोग आते हैं। उनके साथ यह जालसाजी काफी समय से हो रही थी, जहां प्राइवेट बसें भरी हुई जाती थीं और रोडवेज बसें खाली ही निकल जाती थीं।
वहीं कुचामन सिटी एक शिक्षा नगरी है। रोज सैकड़ों छात्र यहां पढ़ने आते हैं। उनको भी अपनी जेब से अतिरिक्त किराया चुकाना पड़ता है।
लोगों की ही नहीं, सरकार की जेब भी काटी
राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) को इससे काफी घाटा हुआ। बसें चल तो रही थीं, लेकिन राजस्व नहीं हो रहा था। ऐसे में जिन सुविधाओं का विकास निगम कर सकता था, उनमें भी कमी आई।
जब ऐसा काम लंबे समय तक किया जाता है तो यह आंकड़ा करोड़ों रुपए तक पहुंच जाता है। यह काम किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की मिलीभगत का है जिसने आम लोगों की जेब काटी और साथ ही सरकार की आय को भी कम किया।
वह सारा पैसा प्राइवेट बसों की तरक्की में लगा जबकि सरकार के हाथ क्या आया? बस एक रिपोर्ट कि सरकारी वाहनों में लोग कम बैठ रहे हैं।
यह तय किया जाना चाहिए कि सरकारी बसों का लाभ हर आम नागरिक को मिले। बिना सवारी लेकर निकलने वाली बसों पर भी कार्रवाई हो तथा इसकी नियमित मॉनिटरिंग की जाए। साथ ही उन कर्मचारियों पर भी कार्रवाई हो जो ऐसे मामलों में सहयोग करते हों।
इसके अतिरिक्त, बुकिंग एवं स्मार्ट कार्ड मासिक पास बनाने की सुविधा कुचामन के पुराने बस स्टैंड पर ही उपलब्ध करवाई जाए। वर्तमान में यात्रियों को इस कार्य के लिए डीडवाना जाना पड़ता है, जिससे उन्हें अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
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