कुचामन सिटी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में वर्षभर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत रविवार को कुचामन स्थित कल्याण मंडप परिसर में प्रमुख जन विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।


कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य गुणवंत सिंह कोठारी, डीडवाना जिले के जिला संघचालक रामअवतार सर्राफ तथा सह-जिला संघचालक श्यामलाल रांदड़ के सान्निध्य में जन गोष्ठी संपन्न हुई। कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।

ज़िले के कार्यवाह प्रमुख पीयूष दवे ने बताया कि गोष्ठी में मुख्य वक्ता गुणवंत सिंह कोठारी ने कहा कि 100 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी और यह कोई संयोग नहीं है। यह हजारों वर्षों से चली आ रही प्राचीन परंपरा का पुनरुद्धार है। जिसमें राष्ट्रीय चेतना प्रत्येक युग की चुनौतियों के अनुरूप नए रूपों में प्रकट होती है। उन्होंने कहा कि आज के युग में संघ उस शाश्वत राष्ट्रीय चेतना का एक सद्गुणी कार्य है।
उन्होंने कहा कि नागपुर से आरंभ हुई संघ की यात्रा आज विश्व के सबसे प्रभावशाली कार्यों में से एक बन चुकी है। यह सौ वर्षों की यात्रा केवल संगठन के परिश्रम की नहीं, बल्कि समाज के सहयोग और सहभागिता की कहानी भी है। युवा स्वयंसेवकों के समर्पण, संत-महात्माओं के आशीर्वाद तथा आमजन के समर्थन ने इस ऐतिहासिक यात्रा को सफल बनाया है।

निस्वार्थ सेवा, अनुशासन और राष्ट्र सर्वोपरि के मूल्यों पर आधारित संघ ने समाज के सहयोग से प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
संघ एक नदी की तरह, अनेक धाराएँ पर एक उद्देश्य
गुणवंत सिंह कोठारी ने संघ की तुलना एक नदी से करते हुए कहा कि जैसे नदी अनेक धाराओं में विभाजित होकर विभिन्न क्षेत्रों को पोषित करती है। उसी प्रकार संघ के विविध सहयोगी संगठन जीवन के सभी पहलुओं शिक्षा, कृषि, समाज कल्याण, जनजातीय उत्थान, महिला सशक्तिकरण, कला, विज्ञान तथा श्रम क्षेत्र में राष्ट्र सेवा में संलग्न हैं। अनेक धाराओं में विस्तार के बावजूद इनमें कभी विभाजन नहीं हुआ। प्रत्येक धारा का उद्देश्य एक ही है राष्ट्र प्रथम।
उन्होंने कहा कि हर युग में संघ ने देश की बड़ी चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया है। स्वतंत्रता संग्राम का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि पूज्य डॉ. हेडगेवार सहित अनेक स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और कई बार कारावास भी भुगता। संघ ने स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता की तथा उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया। उन्होंने 1942 के चिमूर आंदोलन का उदाहरण देते हुए बताया कि अनेक स्वयंसेवकों ने ब्रिटिश अत्याचार सहे थे।
स्वतंत्रता के बाद भी संघ का योगदान जारी रहा – हैदराबाद में निजाम के अत्याचारों का विरोध, गोवा तथा दादरा-नगर हवेली की मुक्ति में सहभाग, इन सबमें संघ का मूल मंत्र सदैव रहा – एक भारत, श्रेष्ठ भारत।
उन्होंने कहा कि आज भारत को विश्व को शांति और सह-अस्तित्व का संदेश देने के लिए और अधिक सशक्त होकर खड़ा होना होगा। इसके लिए समाज की सज्जन शक्ति को आगे आना होगा। विविधता में एकता को समझते हुए सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के माध्यम से समाज को आत्मनिर्भर बनाना होगा। परिवारों में राष्ट्रीय जागरूकता को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है, ताकि भारत के शाश्वत आध्यात्मिक मूल्य और रीति-रिवाज सुरक्षित रह सकें।
शताब्दी वर्ष में संघ का पंच-परिवर्तन – समाज को नई दिशा देने का संकल्प
संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में समाज के व्यापक परिवर्तन के लिए पंच-परिवर्तन पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है –
- सामाजिक समरसता – समाज के सभी वर्गों में सौहार्द और प्रेम बढ़ाना।
- कुटुंब प्रबोधन – परिवार को राष्ट्र निर्माण की मूल इकाई के रूप में सशक्त करना।
- पर्यावरण संरक्षण – पृथ्वी को माता मानते हुए जीवनशैली में पर्यावरण अनुकूल परिवर्तन।
- स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता – स्थानीय उत्पादों व अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।
- नागरिक कर्तव्य – हर नागरिक द्वारा राष्ट्रहित में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन।
विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन रहे उपस्थित
इस जन गोष्ठी में कुचामन, नावा, मकराना और परबतसर क्षेत्र के शैक्षिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं के प्रबुद्धजन, साहित्यकार, पत्रकार, प्रोफेसर, कुलगुरु, कवि, चिकित्सक (आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, एलोपैथिक), उद्योगपति, व्यापारी, बैंक और बीमा क्षेत्रों से जुड़े कर्मी, न्यायिक क्षेत्र, कला, क्रीड़ा, प्रशासनिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य नागरिक उपस्थित हुए। इसके अतिरिक्त स्थानीय व्यापार मंडल, विभिन्न मजदूर संगठनों तथा समाज के विभिन्न वर्गों के बंधुओं ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की।






